
नई दिल्ली। 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक व्यापक महाद्वीपीय दृष्टि प्रस्तुत की, जिसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) कहा गया। यह एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका और यूरोप सहित कई महाद्वीपों को सड़कों, रेलमार्गों, बंदरगाहों, डिजिटल कॉरिडोर और औद्योगिक गलियारों के विशाल नेटवर्क से जोड़ना है। अक्सर प्राचीन सिल्क रोड से तुलना की जाने वाली यह पहल वैश्विक व्यापार को पुनर्परिभाषित करने, चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने और उसके विकास मॉडल को निर्यात करने की कोशिश मानी जाती है।
BRI के प्रमुख घटक
सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट – जो ज़मीनी मार्गों से चीन को मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ता है।
21वीं सदी का मैरीटाइम सिल्क रोड – जो समुद्री मार्गों से चीन को दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व, अफ्रीका और यूरोप से जोड़ता है।
2025 तक, 150 से अधिक देश इस पहल से जुड़ चुके हैं, जिनमें ऊर्जा, खनन, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और परिवहन जैसे क्षेत्रों में ट्रिलियन डॉलर के निवेश शामिल हैं।
चीन की रणनीति
अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का उपयोग – स्टील, सीमेंट और निर्माण उद्योगों की अधिशेष क्षमता को वैश्विक स्तर पर खपाना।
ऊर्जा सुरक्षा – अस्थिर क्षेत्रों से ऊर्जा मार्ग सुनिश्चित करना। उदाहरण: चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC)।
चीन-केंद्रित व्यवस्था – ऋण और व्यापार के ज़रिए भागीदार देशों पर आर्थिक निर्भरता और प्रभाव बढ़ाना।
आलोचनाएँ और चुनौतियाँ
कई देशों जैसे श्रीलंका, मलेशिया और केन्या में परियोजनाएँ अपेक्षित लाभ नहीं दे पाईं और वे अस्थिर कर्ज़ के बोझ में दब गए। हंबनटोटा पोर्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसे श्रीलंका ने कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में चीन को 99 वर्षों के लिए लीज़ पर दे दिया। पश्चिमी देश इसे चीन की कर्ज़-जाल कूटनीति और रणनीतिक विस्तार की योजना मानते हैं।
भारत की स्थिति और अवसर
भारत ने BRI से दूरी बनाई है, खासकर CPEC के कारण, जो पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। हालांकि, इस पहल के वैश्विक प्रभाव को नज़रअंदाज़ करना भारत के लिए संभव नहीं।
भारत क्या कर सकता है?
दृष्टि आधारित कूटनीति – भारत को यूरेशिया और इंडो-पैसिफिक में अपना दीर्घकालिक कनेक्टिव विज़न प्रस्तुत करना चाहिए।
इन्फ्रास्ट्रक्चर डिप्लोमेसी – चाबहार पोर्ट और INSTC जैसे प्रोजेक्ट्स को गति और पैमाना देना होगा।
पड़ोसी प्रथम नीति – नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में समयबद्ध और भरोसेमंद प्रोजेक्ट्स के ज़रिए क्षेत्रीय विश्वास अर्जित करना।
डिजिटल और ग्रीन कॉरिडोर – डिजिटल गठजोड़ और स्वच्छ ऊर्जा साझेदारियाँ चीन के मॉडल का टिकाऊ विकल्प बन सकती हैं।
वैश्विक साझेदारियाँ – अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर PGII जैसे मंचों पर पारदर्शी और समावेशी विकल्प पेश करना।
आज की दुनिया में इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी ही वैश्विक शक्ति की नई मुद्रा हैं। चीन का BRI इस बात की याद दिलाता है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह केवल दर्शक बना रहे या पारदर्शिता, संप्रभुता के सम्मान और सतत विकास पर आधारित अपना विशिष्ट मॉडल पेश कर नए वैश्विक नक्शे को आकार दे।




