
नई दिल्ली/लखनऊ: देश के दो बड़े शहरों दिल्ली और लखनऊ हाल ही में हुए भीषण अग्निकांडों से दहल उठे। दिल्ली के मालवीय नगर और लखनऊ के अलीगंज में हुई आग की घटनाओं ने एक बार फिर देश में फायर सेफ्टी सिस्टम की पोल खोल दी है। दोनों हादसों में कई लोगों की जान चली गई, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दोनों घटनाओं में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही के आरोप सामने आए हैं।
दिल्ली और लखनऊ हादसे में क्या हैं समानताएँ?
दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल और रेस्टोरेंट परिसर में लगी आग में 21 लोगों की मौत हुई थी, जबकि लखनऊ के अलीगंज स्थित प्रशिक्षण केंद्र में आग लगने से कम से कम 14-15 लोगों की जान चली गई। दोनों घटनाओं में लोगों को धुएं और आग से बचने के लिए खिड़कियों से कूदना पड़ा। कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें लोग जान बचाने के लिए ऊंचाई से छलांग लगाते दिखाई दिए।
फायर सेफ्टी पर फिर उठे सवाल
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि दोनों स्थानों पर फायर सेफ्टी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पर्याप्त आपातकालीन निकास, फायर अलार्म और नियमित सुरक्षा जांच होती, तो इतने बड़े स्तर पर जनहानि को रोका जा सकता था।
हर हादसे के बाद जांच, लेकिन बदलाव कब?
हर बड़े अग्निकांड के बाद जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन दिल्ली और लखनऊ की घटनाएं यह सवाल छोड़ गई हैं कि आखिर सुरक्षा नियमों का पालन जमीन पर कब सुनिश्चित होगा? देश के कई शहरों में व्यावसायिक भवनों, कोचिंग सेंटरों और होटलों की सुरक्षा व्यवस्था आज भी सवालों के घेरे में है।
जिम्मेदार कौन?
इन दोनों हादसों ने प्रशासन, भवन मालिकों और सुरक्षा एजेंसियों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि हादसे के बाद कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त और प्रभावी कदम उठाए जाएं।




