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क्या संवैधानिक पदों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए?

 

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में सिर्फ संख्याओं का गणित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श भी तेज हो गया है। अब बहस केवल इस पर सीमित नहीं है कि कौन उपराष्ट्रपति बनेगा, बल्कि यह सवाल केंद्र में आ गया है कि क्या संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति कठोर और स्पष्ट रुख की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए?

ऐसे निर्णायक समय में विपक्षी गठबंधन इंडी (I.N.D.I.) ने उपराष्ट्रपति पद के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाया है। उनका नाम 2011 के उस फैसले से जुड़ा है जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की सलवा जुडूम पहल को असंवैधानिक घोषित किया था। उस समय इस निर्णय को नक्सल विरोधी अभियान के लिए झटका माना गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि उपराष्ट्रपति का चुनाव मात्र एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों और दृष्टिकोणों का भी प्रतीक है जिन्हें देश की सर्वोच्च संस्थाएँ अपनाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद मुक्त भारत का लक्ष्य तय किया है और इस निर्णायक मोड़ पर सुरक्षा-केन्द्रित दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह सच है कि लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल को अपने उम्मीदवार चुनने की स्वतंत्रता है। लेकिन ऐसे समय में, जब देश नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम जंग लड़ रहा है, तब संवैधानिक पदों पर आसीन होने वाले व्यक्तियों की प्रतीकात्मक भूमिका का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

यही कारण है कि विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। रेड्डी 2011 के उस फैसले से जुड़े हैं जिसमें छत्तीसगढ़ सरकार की सलवा जुडूम पहल को असंवैधानिक घोषित किया गया था। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस निर्णय को उस समय नक्सल विरोधी अभियान के लिए झटका माना गया था।

अब विपक्ष के इस चयन को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं यह संदेश तो नहीं जाएगा कि जब सरकार नक्सलवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने में लगी है, तब विपक्ष ने ऐसे व्यक्ति को सामने रखकर अनजाने में उन ताकतों के प्रति सहानुभूति जता दी है जिन्हें जनता बार-बार अस्वीकार कर चुकी है।

असली प्रश्न यही है कि क्या भारत की संवैधानिक संस्थाएँ आने वाले समय में सुरक्षा-केन्द्रित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देंगी या फिर राजनीतिक प्रतीकवाद हावी रहेगा।

bhaiyajgadmin

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