US चाहता था 20 साल का फ्रीज, ईरान 5 साल पर अड़ा—जानिए क्यों नहीं बनी डील
US Iran Nuclear Deal: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई हाई-प्रोफाइल शांति वार्ता से दुनिया को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन बातचीत के पहले ही दिन निराशा हाथ लगी। परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद सामने आए, जिसकी वजह से कोई ठोस समझौता नहीं हो सका।
क्या था पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम को 20 साल के लिए पूरी तरह फ्रीज कर दे। वहीं ईरान ने साफ तौर पर कहा कि वह अधिकतम 5 साल तक ही प्रोग्राम रोकने को तैयार है। यही बड़ा अंतर दोनों देशों के बीच डील फेल होने की सबसे बड़ी वजह बना।
न्यूक्लियर प्रोग्राम क्यों बना सबसे बड़ा विवाद?
ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अमेरिका के लिए चिंता का विषय रहा है। अमेरिका का मानना है कि अगर ईरान को घरेलू स्तर पर यूरेनियम एनरिचमेंट की अनुमति दी गई, तो वह भविष्य में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है। हालांकि, इस बार संकेत मिले हैं कि अमेरिका अपने रुख में थोड़ी नरमी दिखा सकता है, लेकिन अभी भी कई शर्तों पर सहमति बनना बाकी है।
क्या पूरी तरह टूट गई बातचीत?
बातचीत स्थगित होने की घोषणा जेडी वेंस द्वारा की गई, लेकिन अंदरखाने से आ रही खबरें कुछ और ही कहानी बता रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, वार्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दोनों पक्ष अभी भी समझौते की अवधि (Duration) पर चर्चा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि 12.5 साल (साढ़े 12 साल) का मध्य रास्ता निकल सकता है।
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इस्लामाबाद में कैसे हुई गुप्त बैठक?
यह अहम बातचीत इस्लामाबाद के लक्जरी सेरेना होटल में आयोजित की गई थी। अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधियों को अलग-अलग विंग में रखा गया। एक कॉमन एरिया में पाकिस्तानी मध्यस्थों की मौजूदगी में ट्राइलेटरल मीटिंग हुई। सुरक्षा इतनी सख्त थी कि किसी को भी फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी।
1979 के बाद सबसे बड़ी बातचीत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता ईरान की इस्लामिक क्रांति (1979) के बाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बातचीत थी। इसका असफल होना वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
आगे क्या?
भले ही औपचारिक रूप से वार्ता स्थगित कर दी गई हो, लेकिन दोनों देशों के बीच बैक-चैनल बातचीत जारी रहने की संभावना है। अगर समझौता होता है, तो यह मध्य पूर्व में स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा कदम साबित हो सकता है।




